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तुम्हारा प्रेम

तुम्हारा प्रेम
इस पत्थर ..
दिल को ...
मोम बना गया ...
खुद निष्ठुरता
अमाया में ..
मेरा दिल
तलाशता है ...
तुम को ,
गुनगुनी धूप में
बादल की छाँव में ,
रंगों में ..
रंजो में ..
कलकल में ..
कलरव में ...
खुद में महसूस करता हूँ ..
हर क्षण में ...
नदियाँ में ..
कलकल में  ,
एकांत में ,
तुम्हें महसूस करता हूँ ..
अपनी धडकनों में तुम्हें सुनता हूँ ..
जब बर्फ़ सा पत्थर था दिल
तुमने तपन बन पिघलाया ..
आज बन पानी उबल रहा हूँ ,
बस कुछेक स्मृतियों के नगर बसे हैं हृदय में ..।

चन्द्र प्रकाश बहुगुना / माणिक्य

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