सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

तुम्हारा प्रेम

तुम्हारा प्रेम
इस पत्थर ..
दिल को ...
मोम बना गया ...
खुद निष्ठुरता
अमाया में ..
मेरा दिल
तलाशता है ...
तुम को ,
गुनगुनी धूप में
बादल की छाँव में ,
रंगों में ..
रंजो में ..
कलकल में ..
कलरव में ...
खुद में महसूस करता हूँ ..
हर क्षण में ...
नदियाँ में ..
कलकल में  ,
एकांत में ,
तुम्हें महसूस करता हूँ ..
अपनी धडकनों में तुम्हें सुनता हूँ ..
जब बर्फ़ सा पत्थर था दिल
तुमने तपन बन पिघलाया ..
आज बन पानी उबल रहा हूँ ,
बस कुछेक स्मृतियों के नगर बसे हैं हृदय में ..।

चन्द्र प्रकाश बहुगुना / माणिक्य

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वर्ण पिरामिड

तू मुझे जग से प्यारा ही है ना छोड़ के जा मेरी पूजा भी तू माँ जमीं में देवता ।। मैं बिन तेरे हूँ अधूरा सा गम में मारा लगता क्यों सारा बनता हूँ .....बेचारा ।। चंद्रप्रकाश बहुगुणा /म...

।। मैं और मेरा भोला पन ।।

लोग चांद तक पहुंच गये .....       मैं बचपन के खिलौनों से खेलता हूं....                              लोग इतने चालाक हो गये कि मत पूछ चन्दर  ....                  मैं अभी भी हालातों के उख...

होली

अगली होली आप लोगों के साथ हो , इसी लिए दूर हूँ । सब को शुभकामनायें , बधाई रंगोत्सव की ... जीवन रंगमय हो सब का , रंग बसन्त सा हो सब का , कुछ हालात हैं हम दूर हैं . वरना पास आ जाता कब का ।    ...