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कृष्ण जी

हर डाली हर पत्ते कण-कण में
जनों के उर कंठ मन-मन में
मुझे तू ढूढ़ता मन्दिर में
मैं ही तो हूँ इस सुबह -रात्रि में ।

कृष्ण रहते अभी भी भक्त उर में ..
कहीं गुरु कहीं माँ-बाप में ...
तुम्ही में हूँ तुम्हारे रोम  में ..
फिर क्यों ढूढ़ता तू पत्थर में ।

©चंद्रप्रकाश/पंकज/माणिक्य बहुगुना

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