मैं टापर हूँ बिहार का ..। देश का भविष्य हूँ । चाणक्य हूँ मैं । मैं ही बूद्ध हूँ । नये ज्ञान का सृजन हूँ मैं ..। मैं ही ज्ञान -विज्ञान हूँ । टापर हूँ मैं । माणिक्य बहुगुना
मेरे अनुभव एवं इस समाज की स्थिति का वर्णन किया गया है ।
मेरे अनुभव एवं इस समाज की स्थिति का वर्णन किया गया है ।
हर डाली हर पत्ते कण-कण में
जनों के उर कंठ मन-मन में
मुझे तू ढूढ़ता मन्दिर में
मैं ही तो हूँ इस सुबह -रात्रि में ।
कृष्ण रहते अभी भी भक्त उर में ..
कहीं गुरु कहीं माँ-बाप में ...
तुम्ही में हूँ तुम्हारे रोम में ..
फिर क्यों ढूढ़ता तू पत्थर में ।
©चंद्रप्रकाश/पंकज/माणिक्य बहुगुना
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