तुम से हजारों बार मिला हूँ ..
हर बार मिलने के लिए बेचैन रहता हूँ ..
सुन रही हो ना तुम ?
वो देखो ..
तुम देख रही हो ना ?
सूरज जो शर्मा रहा है ..
हम को देख और छुप गया है माँ के पल्लू से ..
वो दूर खड़े हंसों के जोड़ों को देख रही हो ना..?
हमें उन से सीखना चाहिए ।
प्रेम बिना आवरण का विशुद्ध ..
देखो पर्वतों का आकाश को चूमना ....
तितलियों का पराग में मद मस्त होना ..
उस पेड़ के पत्तों के राग सुनो ...
तुम्हारी तरह गाते हैं ...
चलो मैं तुम को तुम मुझ को पढ़ो ..
हँसो तुम हँसो मुझे पढ़ कर ..
तुम्हारा चन्दन देह ..
दिल मेरी देह की औषधी है ।
बस यूँ ही मिलो बस ...
और यूँ ही हँसो ...
माणिक्य बहुगुना
तू मुझे जग से प्यारा ही है ना छोड़ के जा मेरी पूजा भी तू माँ जमीं में देवता ।। मैं बिन तेरे हूँ अधूरा सा गम में मारा लगता क्यों सारा बनता हूँ .....बेचारा ।। चंद्रप्रकाश बहुगुणा /म...
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