निशा के प्राण पखेरु उड़ गए रात काली में ,
कुछ वृद्ध हो चली रजनी सुबह की लाली में ।
अली करते गुंजंन हर प्रसून डाली में ,
विहग मदमस्त डोल रहे शैशव दिनकर लाली में ।
माँ नव शिशु को थपकी देती मोह की जाली में ,
माँ का स्नेह कुछ अधिक होता बाल पतंग लाली में ।
सब धर्मों को प्रकाश देता दिनकर भोर की लाली में ,
ज्यूं वृक्ष पोषण देता हर इक डाली में ।
मैं टापर हूँ बिहार का ..। देश का भविष्य हूँ । चाणक्य हूँ मैं । मैं ही बूद्ध हूँ । नये ज्ञान का सृजन हूँ मैं ..। मैं ही ज्ञान -विज्ञान हूँ । टापर हूँ मैं । माणिक्य बहुगुना
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें