गिलहरी मेरे बग़ीचे की .
स्वतन्त्र , उन्मुक्त .
लोक लाज से ,
वस्त्रों से ,
लिंग भेद से,
भ्रूण हत्या से,
जातियों से ,
आरक्षण से ,
कुरीतियों से ,
शादी , दहेज़ से ,
स्कूली शिक्षा से ,
पदवी से ,
वादों से ,
कृत्रिम शारीरिक सुंदरता से ,
कृत्रिम प्रेम से ,बातों से ,
देह के अकारण भूख से ,
बस प्रेम करते हैं ..
किसी से भी कभी भी कहीं भी ,
उनके समाज में दंगे नहीं होते हैं ,
खून नहीं बहाया जाता है किसी का भी ,
बस प्रेम करते हैं ...
माणिक्य बहुगुना / पंकज / चन्द्र प्रकाश
तू मुझे जग से प्यारा ही है ना छोड़ के जा मेरी पूजा भी तू माँ जमीं में देवता ।। मैं बिन तेरे हूँ अधूरा सा गम में मारा लगता क्यों सारा बनता हूँ .....बेचारा ।। चंद्रप्रकाश बहुगुणा /म...
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