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मुक्तक

बस गया एक नगर ,
तुम्हारी स्मृतियों का इस हृदय में ।
खोलता हूं हृदय पट ,
तुम्हें पाता हूं सब में ।।1।।

चन्द्रप्रकाश बहुगुना

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