मुक्तक जुलाई 03, 2015 बस गया एक नगर , तुम्हारी स्मृतियों का इस हृदय में । खोलता हूं हृदय पट , तुम्हें पाता हूं सब में ।।1।। चन्द्रप्रकाश बहुगुना शेयर करें लिंक पाएं Facebook X Pinterest ईमेल दूसरे ऐप लेबल दिल्ली शेयर करें लिंक पाएं Facebook X Pinterest ईमेल दूसरे ऐप टिप्पणियाँ
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