तुम चाँद बन आना...
मेरे कमरे के पास ,
कुछ इठलाना ..
कुछ मुस्कुराना,
वो अँधेरे में रौशनी ...
बन खिड़की से झांकना ,
मुझे उठना ...
कुछ देर इन कन्धों में ...
सिर रखना ,
कुछ गुनगुनाना ..
हँसना, हँसना ...
वो स्वेत धवल सा मन ..
को भाना ..
और कहते तुम भी मुझे को भाते हो ,
बस मज़बूरी अमावस की..,
मैं कहता एक दिन की बात करती हो ..
मैं पल - पल तुझ में जीत हूँ ..
कुछ स्वेत अश्रु बहते नैनन से ..
वो तारे बन जाते हैं ।
सूरज की किरणें जब थल में ..
आ जाती हैं ,
वो मज़बूरी में मुझे छोड़कर जाती है ।
काश निश दिन ये ..
दिनचर्या होती ।।
काश यूँ ही हर पल ...
वो साथ होती ।।
तू मुझे जग से प्यारा ही है ना छोड़ के जा मेरी पूजा भी तू माँ जमीं में देवता ।। मैं बिन तेरे हूँ अधूरा सा गम में मारा लगता क्यों सारा बनता हूँ .....बेचारा ।। चंद्रप्रकाश बहुगुणा /म...
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