मैं जिस में जीत हूँ मरता हूँ ...
मैं वो बात तुम्हें बताता हूँ ।
तेरे आँखों के अश्कों में जीत हूँ ..
तेरी झील सी आँखों में मरता हूँ ।
लबों की हँसी में मैं ही बसता हूँ ....
तेरे ही दुःख में मरता हूँ ।
तुम्हारे अंतस मन में बसता हूँ ...
तुम्हारी इस पीड़ा में मरता हूँ ।
तुम्हारे गालों की लाली में ..
तुम्हारे सांसों के सांसों में बसता हूँ ।
तुम्हारे रोमों में , नस-नस में...
तुम्हारी धड़कन में मैं ही बसता हूँ ।।
तुम्हारी रातों की नींदों में ...
दिन के कामों में मैं ही बसता हूँ ।
तुम्हारी डर में ,लज्जा में ...
शरमाने में मैं ही बसता हूँ ।
तू मुझे जग से प्यारा ही है ना छोड़ के जा मेरी पूजा भी तू माँ जमीं में देवता ।। मैं बिन तेरे हूँ अधूरा सा गम में मारा लगता क्यों सारा बनता हूँ .....बेचारा ।। चंद्रप्रकाश बहुगुणा /म...
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